‘गुड़हल’

जड़ जैसे जाड़े का अंत हुआ।
ठिठुरा उपवन अब लामबंद हुआ।
कुंद-मंद ज्यों मांद से निकला।
शीत पुष्पन हौले से खिसका।
ऋतुओं के नियत चक्र ने देखा।
एक आया, एक गया।
किंतु समय स्वतंत्र, समय सापेक्ष।
कोई ऐसा था ,जो बना रहा।
वह स्थानीय गाढ़ा गुड़हल।
सदापर्णी था,सदापर्णी रहा।
कुठार-तुषार के थपेड़े थे।
तापाघात के कोड़े थे।
वह थोड़ा-थोड़ा बदरंग हुआ।
किंतु संग सोया, संग जगा।
वह सगा क्या जो मौसम ताके?
वह श्रद्धा क्या जो विपरीत में भागे?
उनींदे फूल तक उसके पाबंद।
डाल से टूटकर भी दिखे चाकचौबंद।
गंधविहीन और शूलमुक्त।
क्या पात और क्या पुष्प।
उसका रहा सर्वांग समर्पित।
पुष्प संवर्ग में फिर भी था उपेक्षित।
प्रेयसी के तो मन ना भाया।
मालिन ने भी कहाँ सजाया?

ये रूप-रस के भौंरे तो क्षण भर के।
इधर उड़े कभी उधर उड़े।
गुणों के चितेरे प्रतिक्षण के।
घुले-मिटे को भी अमिट रखें।
उसे निष्ठाओं के प्रतिफलन स्वरूप।
सिंहवाहिनी ने सिरमौर बनाया।
….पूजा सक्सेना…

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‘बीज’

मैं एक अनगढ़ बीज।
अबूझ-औघड़, दबा-मसला।
मेरी अल्प वय,मेरी सूक्ष्म लय।
अपेक्षा-आशंका के बोझ तले।
पैठने की थाह,फूटने की चाह।
नभ मेह की बस बाट तके।
करूँगा पत्र दलन,ये चित्त दमन।
शनैः-शनैः होगा आत्मक्षरण।
ये दम घोंट घुटन, तम घोर गहन।
सर्र-सर्र सरकते व्यंग्य बाण-शर।
क्या विचित्र जगत?तत्पर ही त्रस्त!
स्वावलंबन को करता ध्वस्त।
फलांगते को फाँस, फड़कते को फूँक।
चमकते को चौंध,धुन के धुनी को धुँध!
मेरा धीर अपार, करे प्रतिरोध पार।
लो..हूँ ,स्फुटन हेतु तैयार।
मेरा प्रयाण,मेरा निश्वास।
घनघना कर करेगा मेरा उद्विकास।
…पूजा सक्सेना…

‘दीपमालिका’

दीपमालिका आलोकित है।
एक लय ,एक भाव लिए।
ज़िसका शीर्ष भी संगत तो गर्त भी।
नीरव को भेदता सूक्ष्म किंतु उज्जवल तेज।
ज़िसने किया यामिनी को लाचार व निस्तेज।
धन्य वह कुम्हार ज़िसने दीप गढ़ा।
नमन वह साधना ज़िसने मिटटी को मढ़ा।
यह अनमोल कौशल किंतु कितना विनम्र।
अपनी ही आजीविका में दिखता सदा व्यग्र।
सहसा कुछ हुआ कि लय भंग हुई।
एक बाती तेल अथाह में ड़ूबने लगी।

बाती रूआंसी हो सकुचाई, घबराई।
तभी गृहलक्षमी की रूनझुन आहट हुई।
लाल महावार से सजे पैरों में वह रजत पायल थी।
बाती ने ऊपर झांका
आवरित नेत्र घूँघट एक सलोनी स्त्री को पाया।
ज़िसकी कनक नथ दीपओज से दैदीप्यमान थी।
एक अंगुष्ठ – तर्जनी वलय प्रकट हुआ।
ज़िसने बाती को उदग्र कर दिय़ा।
पुनः बाती दीपमालिका संग लयताल हो गई।
धरा के कण- कण की सार्थकता साकार हो गई।
क्या कुम्हार ,क्या दिया ,क्या बाती?
कहीं दियासलाई तो कहीं मात्र मर्मस्पर्श।
सार्थी तो सभी रहे।
वह स्याह रात्रि और समीर निर्द्वन्द निस्तब्ध
सम्यक कर्म ,सम्यक प्रभाव।
किंतु कितना निःस्वार्थ ,निरलिप्त,नितांत निस्पृह।
….पूजा सक्सेना …

‘समर्पण’

एक समय का ठहर जाना।
जहाँ बोझ हस्तांतरित नही होता।
बसेरा शाखित नही होता।
जहाँ पलस्तर की पपड़ियों का।
झुर्रियों की सिलवटों का।
चलता रहता है तो मात्र लीपना-पोतना।
एक तदनंतर क्रम का बाधित रहना।
वट की वृहद् आड़ में अटकना।
या दड़बे में दुम सा दुबकना।
ये क्या थोड़ा-थोड़ा सा ही पनपना?
स्नेह पाश की जकड़ने हैं
या बढ़वार की अड़चनें।
पंख फड़फड़ा रह जाते।
कोकून में असहाय छटपटाते।
यदि लार्वा का कायांतरण नही।
उड़ानों का अभिप्रेरण नही।
तो नियत होगा।
जीवन-चक्र का अवक्रमण।
पीढ़ियों का अवनयन।
खूँटे को पकड़ छोड़नी होगी।
असुरक्षित राहें संजोनी होगीं।
नवांकुर को है दूर तक जाना।
जीर्ण काया का कितना ठिकाना।
स्वार्थ भींचकर रिक्त रह जाता।
समर्पण त्याग कर तृप्त हो जाता।
पूजा सक्सेना….
बून्दी, राजस्थान।

वृष्टि-कुशा(Rain-grass)

कोण-कोण छितराई ये वृष्टि कुशा।
विहंगम हरितिमा में अंश है उसका।
झंझाओं की गर्जन से
रिमझिम की रुनझुन तक।
बौछारों की बौराहट से
मूसलाधार की गुर्राहट तक।
एक स्वगृहीत संकल्प है उसका।
अनायास स्वत्व पसर जाना।
अनिमंत्रित निसंकोच बसर करना।
कहीं पहाड़ी की मलहम बन जाना।
कहीं बगिया की खरपत बन जाना।
एक निष्काम सा उद्भव।
एक नियत सा प्रारब्ध।
कभी चराहार हो जाना।
कभी बहिर्विष्ट कर दिया जाना।
अल्पकालिक ही ठहरना।
किंतु गहरी पकड़ रखना।
अतः समापन मात्र पटल पर।
विलोपन मात्र ऋतु भर।
पुनः जब घनकालिमाएं बरसेगीं।
जिजीविषा मूलें बारंबार पनपेगीं।
….पूजा सक्सेना…

‘छिटक गए थे जो’

पुनः एक परिभ्रमण पूर्ण हुआ।
धुरी के जड़त्व में आ संपूर्ण हुआ।
दिखते कहाँ थे?
उँचे बाँस के उँचे पग।
छँटे तो खोखलेपन का बोध हुआ।
पेड़ की छाल में भृग भरे थे।
वृद्ध तने के वलय अड़े थे।
किसी चोंच की ठोंक सा आभास हुआ।
कोई बिसरा-बिसूरा साक्षात हुआ।
मदांध की थीं दुर्दांत उड़ानें।
ऊँची-अबोली होती गईं।
बचपन की लय बहुत तेज थी।
दूर-दराज का करती गई।
कलम मनमौजी बहुत थी।
पटकथाएं बदलने लगी।
नायक का अवसान लिखा।
सत्ताएँ पलटने लगी।
विधि का क्रम तो नियत चला था।
बीते-गुजरे का शोक बहुत था।
समय के आधे-उधड़े का।
हो सका जितना रफू हुआ।
उठते-बढ़ते, गिरते-पड़ते।
पुनः एक परिभ्रमण पूर्ण हुआ।
….पूजा सक्सेना…

‘पहाड़ी मौन’

शिखरस्थ आरूढ़ता।

धवल शीर्ष और लहराता परचम।

पैनी ऊँचाईयाँ और अभूत पराक्रम।

ओढ़े रहता है-एक सम्मानित मौन।

स्वतः सिद्ध की शब्दाल्पता लिए।

विशिष्ट हो जाने की पृथकता लिए।

एक अतिसाधारण की उच्चता।

एक दक्ष की मान्यता।

जो सदैव प्रदान करती है,

घाटियों को भरपूर सौगातें।

जो प्रायः ढोया करती है,

आभारविहीन धृष्टताएँ।

जो अवाक रह जाती है,

सुन किन्हीं छदम कीर्तियों की गाथाएँ।

जो पाबंद रखती है,

हिमरेखा तक कठोर नियंत्रण

एवं हिमनदों का शनैः-शनैः विसर्पण।

ऊँचाईयों का ऋण ही तो कदाचित्

अधोवनत नियति रहना।

शिखर द्वारा आपूर्ति

एवं आधार द्वारा प्राप्ति।

लक्ष्यों के हठीले प्रण ही तो संभवतः

नीलकेश संग आनंदित रहना

एवं मूक – अभिमानी की पदवी लेना।

…पूजा सक्सेना…

‘आमंत्रण’

ये गर्जनाएँ अकारण नही उठीं।
सतहों ने आग्रह किया।
समदैशिक का विग्रह किया।
तो निर्वहन आहूत हुआ।
छूटें अब वर्जनाएँ, विश्रामगाहें
संकरी राहें व मंडूक कंदराएं।
हो दायित्वों की प्रतीति,
नम्र स्वर लें अब उग्र आवृत्ति।
अवसर साधकों की संभाव्य सीत-निद्रा में
सुधि-सक्षम ही तो अनुकूलन करेंगे।
जलती रेत में मरूदभिद् से डटेगें।
हिमपात में कोणधारी से अड़ेगें।
पर्णपातियों में पलाश बन हँसेगें।
तो तपती धूप में रस-रस हो घुलेगें।
ऊँचाईओं की निश्चिंत विरलता त्याग,
घनीभूत हो स्थूल-श्याम।
उमड़-घुमड़ घनघोर बरसेगें।
वसुधांक का आमंत्रण
एवं कुछेक का उत्प्रेरण।
मात्र यही तो है,
सुरम्य सृष्टि का निहितार्थ।
. …….पूजा सक्सेना…..

‘आमंत्रण’

ये गर्जनाएँ अकारण नही उठीं।
सतहों ने आग्रह किया।
समदैशिक का विग्रह किया।
तो निर्वहन आहूत हुआ।
छूटें अब वर्जनाएँ, विश्रामगाहें
संकरी राहें व मंडूक कंदराएं।
हो दायित्वों की प्रतीति,
नम्र स्वर लें अब उग्र आवृत्ति।
अवसर साधकों की संभाव्य सीत-निद्रा में
सुधि-सक्षम ही तो अनुकूलन करेंगे।
जलती रेत में मरूदभिद् से डटेगें।
हिमपात में कोणधारी से अड़ेगें।
पर्णपातियों में पलाश बन हँसेगें।
तो तपती धूप में रस-रस हो घुलेगें।
ऊँचाईओं की निश्चिंत विरलता त्याग,
घनीभूत हो स्थूल-श्याम।
उमड़-घुमड़ घनघोर बरसेगें।
वसुधांक का आमंत्रण
एवं कुछेक का उत्प्रेरण।
मात्र यही तो है,
सुरम्य सृष्टि का निहितार्थ।
. …….पूजा सक्सेना…..

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