‘समर्पण’

एक समय का ठहर जाना।
जहाँ बोझ हस्तांतरित नही होता।
बसेरा शाखित नही होता।
जहाँ पलस्तर की पपड़ियों का।
झुर्रियों की सिलवटों का।
चलता रहता है तो मात्र लीपना-पोतना।
एक तदनंतर क्रम का बाधित रहना।
वट की वृहद् आड़ में अटकना।
या दड़बे में दुम सा दुबकना।
ये क्या थोड़ा-थोड़ा सा ही पनपना?
स्नेह पाश की जकड़ने हैं
या बढ़वार की अड़चनें।
पंख फड़फड़ा रह जाते।
कोकून में असहाय छटपटाते।
यदि लार्वा का कायांतरण नही।
उड़ानों का अभिप्रेरण नही।
तो नियत होगा।
जीवन-चक्र का अवक्रमण।
पीढ़ियों का अवनयन।
खूँटे को पकड़ छोड़नी होगी।
असुरक्षित राहें संजोनी होगीं।
नवांकुर को है दूर तक जाना।
जीर्ण काया का कितना ठिकाना।
स्वार्थ भींचकर रिक्त रह जाता।
समर्पण त्याग कर तृप्त हो जाता।
पूजा सक्सेना….
बून्दी, राजस्थान।

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वृष्टि-कुशा(Rain-grass)

कोण-कोण छितराई ये वृष्टि कुशा।
विहंगम हरितिमा में अंश है उसका।
झंझाओं की गर्जन से
रिमझिम की रुनझुन तक।
बौछारों की बौराहट से
मूसलाधार की गुर्राहट तक।
एक स्वगृहीत संकल्प है उसका।
अनायास स्वत्व पसर जाना।
अनिमंत्रित निसंकोच बसर करना।
कहीं पहाड़ी की मलहम बन जाना।
कहीं बगिया की खरपत बन जाना।
एक निष्काम सा उद्भव।
एक नियत सा प्रारब्ध।
कभी चराहार हो जाना।
कभी बहिर्विष्ट कर दिया जाना।
अल्पकालिक ही ठहरना।
किंतु गहरी पकड़ रखना।
अतः समापन मात्र पटल पर।
विलोपन मात्र ऋतु भर।
पुनः जब घनकालिमाएं बरसेगीं।
जिजीविषा मूलें बारंबार पनपेगीं।
….पूजा सक्सेना…

‘छिटक गए थे जो’

पुनः एक परिभ्रमण पूर्ण हुआ।
धुरी के जड़त्व में आ संपूर्ण हुआ।
दिखते कहाँ थे?
उँचे बाँस के उँचे पग।
छँटे तो खोखलेपन का बोध हुआ।
पेड़ की छाल में भृग भरे थे।
वृद्ध तने के वलय अड़े थे।
किसी चोंच की ठोंक सा आभास हुआ।
कोई बिसरा-बिसूरा साक्षात हुआ।
मदांध की थीं दुर्दांत उड़ानें।
ऊँची-अबोली होती गईं।
बचपन की लय बहुत तेज थी।
दूर-दराज का करती गई।
कलम मनमौजी बहुत थी।
पटकथाएं बदलने लगी।
नायक का अवसान लिखा।
सत्ताएँ पलटने लगी।
विधि का क्रम तो नियत चला था।
बीते-गुजरे का शोक बहुत था।
समय के आधे-उधड़े का।
हो सका जितना रफू हुआ।
उठते-बढ़ते, गिरते-पड़ते।
पुनः एक परिभ्रमण पूर्ण हुआ।
….पूजा सक्सेना…

‘पहाड़ी मौन’

शिखरस्थ आरूढ़ता।

धवल शीर्ष और लहराता परचम।

पैनी ऊँचाईयाँ और अभूत पराक्रम।

ओढ़े रहता है-एक सम्मानित मौन।

स्वतः सिद्ध की शब्दाल्पता लिए।

विशिष्ट हो जाने की पृथकता लिए।

एक अतिसाधारण की उच्चता।

एक दक्ष की मान्यता।

जो सदैव प्रदान करती है,

घाटियों को भरपूर सौगातें।

जो प्रायः ढोया करती है,

आभारविहीन धृष्टताएँ।

जो अवाक रह जाती है,

सुन किन्हीं छदम कीर्तियों की गाथाएँ।

जो पाबंद रखती है,

हिमरेखा तक कठोर नियंत्रण

एवं हिमनदों का शनैः-शनैः विसर्पण।

ऊँचाईयों का ऋण ही तो कदाचित्

अधोवनत नियति रहना।

शिखर द्वारा आपूर्ति

एवं आधार द्वारा प्राप्ति।

लक्ष्यों के हठीले प्रण ही तो संभवतः

नीलकेश संग आनंदित रहना

एवं मूक – अभिमानी की पदवी लेना।

…पूजा सक्सेना…

‘आमंत्रण’

ये गर्जनाएँ अकारण नही उठीं।
सतहों ने आग्रह किया।
समदैशिक का विग्रह किया।
तो निर्वहन आहूत हुआ।
छूटें अब वर्जनाएँ, विश्रामगाहें
संकरी राहें व मंडूक कंदराएं।
हो दायित्वों की प्रतीति,
नम्र स्वर लें अब उग्र आवृत्ति।
अवसर साधकों की संभाव्य सीत-निद्रा में
सुधि-सक्षम ही तो अनुकूलन करेंगे।
जलती रेत में मरूदभिद् से डटेगें।
हिमपात में कोणधारी से अड़ेगें।
पर्णपातियों में पलाश बन हँसेगें।
तो तपती धूप में रस-रस हो घुलेगें।
ऊँचाईओं की निश्चिंत विरलता त्याग,
घनीभूत हो स्थूल-श्याम।
उमड़-घुमड़ घनघोर बरसेगें।
वसुधांक का आमंत्रण
एवं कुछेक का उत्प्रेरण।
मात्र यही तो है,
सुरम्य सृष्टि का निहितार्थ।
. …….पूजा सक्सेना…..

‘आमंत्रण’

ये गर्जनाएँ अकारण नही उठीं।
सतहों ने आग्रह किया।
समदैशिक का विग्रह किया।
तो निर्वहन आहूत हुआ।
छूटें अब वर्जनाएँ, विश्रामगाहें
संकरी राहें व मंडूक कंदराएं।
हो दायित्वों की प्रतीति,
नम्र स्वर लें अब उग्र आवृत्ति।
अवसर साधकों की संभाव्य सीत-निद्रा में
सुधि-सक्षम ही तो अनुकूलन करेंगे।
जलती रेत में मरूदभिद् से डटेगें।
हिमपात में कोणधारी से अड़ेगें।
पर्णपातियों में पलाश बन हँसेगें।
तो तपती धूप में रस-रस हो घुलेगें।
ऊँचाईओं की निश्चिंत विरलता त्याग,
घनीभूत हो स्थूल-श्याम।
उमड़-घुमड़ घनघोर बरसेगें।
वसुधांक का आमंत्रण
एवं कुछेक का उत्प्रेरण।
मात्र यही तो है,
सुरम्य सृष्टि का निहितार्थ।
. …….पूजा सक्सेना…..

‘निस्पंदक’

किसी गतिक को मिलते आंतरायिक नियंत्रक
निर्बाध लय को तो लगते किरकिरे अवरोधक ।
किसी कुठार के कठोर प्रहार जैसे,
किसी दंश के दाहक प्रभाव जैसे।
निमिष-निमिष छानते हुए निस्पंदक।
रूखे-सपाट किंतु शुभचिंतक।
कपाट की साँकल जैसे,
भ्रूण की आँवल जैसे।
गारे संग चुनते-तराशते से,
कर्तनी संग छीजते-छीलते से।
लेते पारंगत की परीक्षा,
करते प्रस्तुत की समीक्षा।
सर्वांग सम्यकता के प्रणेता,
संगत क्रमिकता के अग्रेता।
कसैली नीम निम्बोली से,
तिक्त चरपरी मिर्ची से ।
जो नकार इन्हें ठुकरसुहाती ही सुनते,
ढीले ढेर के शीर्ष से भरभरा ढह जाते।
जो चुभते बाण सह लेते,
उदात्त व्योम के उदार पटल पर
ध्रुव तारे से चमकते।
…….. पूजा सक्सेना….

‘प्रक्षालित हिय’

यहाँ परिपूर्णता की संतृप्तता है
या एक समावेशी ग्राहयता।
अगाध से अघा जाना
या तात्विक निरर्थकता का ज्ञान होना।
मंद-मंद सा तरंगित रहना
या कुचेष्टाओं की ढिठाई सहलाना।
घोलना घाट-घाट की परछटें
बन जाना एक सतर्क श्रोता, एक संयमित वक्ता।
कालायिक रंगतों की ले विशुद्ध सराबोरी।
सजीले नक्षत्रों की झिलमिलाहट भी।
निखरी धूप की गर्माहट भी।
हिस्से के निवाले छोड़ता।
निज पलड़े कोरे रखता।
कमानी भ्रमित डगमगाई रहती।
क्षुधा-तृष्णा मुँह चिढ़ातीं।
द्रव-वाष्प क्रम एकांतर रहता।
बीतता ना रीतता।
विक्षोभ आते, लौट जाते।
अविचल, अक्षुण्ण बना रहता।
यह जलधि सा अतीव विस्तरण।
स्निग्ध-समन्वित पवनानुचरण।
…..पूजा सक्सेना…..
बू्न्दी,राजस्थान

‘स्वप्रेरित’

एक पहाड़ के शिखर का आशावादी ,
धुंधलके में टोह छाँटता अन्वेषी ।
जिसे जूझना ही होता है।
स्वयं की अडिगता से
तो अविश्वासपूर्ण प्रत्यक्ष दृश्यता से ।
एक वर्तुल भँवर
औऱ उसमें निहित अभिकेंद्रीयता।
लेना चाहती है उसे चपेटे में ।
अट्टहास करती हुई
कि उसने कितने ही धराशायी किए।
कितने भ्रम -भुलावे तोड़े।
कि व्यूह मात्र दूसरों के लिए नही होते ।
वह दिखाना चाहती है उसे
ढालों की तीक्ष्ण प्रवणता
और अंधेरी खाईयों की गहनता ।
जहाँ दुरूह असाध्यताएं हैं
दम तोड़ती उत्कंठाएं हैं।
जहाँ घिरे हुओं के स्मारक हैं।
स्मरण करवाते हुए
कि विलीनता ही व्यूह का निग्रह है ।
पर नही अटकता कंटीली झाड़ियों में
झंझावातों से घिरा वह निश्चयी ।
किसी फटी बिवाई पथराई जमीन से भी
उसे आस के अंकुरण की प्रतीक्षा है ।
तो एक लक्ष्यार्थ भिड़ते -बढ़ते हुए को
मात्र विलोपन का ही निनाद क्यों
विकटता में प्रतिमान रचने का उदघोष भी तो हो ।
…..पूजा सक्सेना ..

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