…. आरोहण..

आकाश की असिमित ऊँचाई चुनी थी उसने

भुजाओं में सशक्तता थी ,उर था विश्वास से ओत प्रोत

आकंक्षाएं अपार,समक्ष निःशब्द आन्दोलित सागर 

वह कठोर तप ही था जो ना नींद से थका 

ना गर्जन से डरा 

किंतु भूल बैठा कि ऊँचाई का आरोहण

सागर का मंथन,  धरा का कर्षण,भूगरभ का भेदन

 कुछ भी एकपक्षीय संभव नहीं वरण

वह रामायण  सृजन,अवतार आगमन 

 दानव दमन सिद्ध करता मात्र स्वकर्म पर्याप्त नहीं 

अष्टविमीय सधाना करनी होगी 

सूक्ष्म कणों को भी साधना होगा 

ना हो उपेक्षा कोमल भावों की 

ना हो उपहास पवित्र संस्कारो का 

धरा के सूकक्षमों व कोपलों को रौन्दकर

 पारश्व से बेखबर मांजिल पर नहीं पहुँचा जाता 

नभ के तारे हिसाब मांगते हैँ

 क्या धरा से उऋण होकर आये हो 

यदि नहीं तो विस्तार में भी स्थान नहीं मिलेगा 

ज़ाओं सबको साथ लो फिर आना 

वह ठगा सा गिनता रहा 

वह रातों की ज़ंग,वह स्वेद सिंचंन

.क्या सब कुछ है अकिंचन…

                                    पूजा सक्सेना

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‘प्रवाह’

                    

राहगीर सी जब प्रवृति थी 

ना कभी मन उद्विगन हुआ था ,ना कभी कोई व्यथा थी 

निरल्पित ,निषकाम भाव थे 

उन्मुक्त विहंग सा मनोहारी जीवन था 

कोमल निशछल संवेगों के साथ 

स्वयं भी बढा,अन्यों को भी ले चला 

लेकिन राहगीर ने जब ठिया पकड़ा

भ्रम और भुलावों के मकड़जाल ने आ ज़कड़ा

कल -कल बहती नदी में जैसे आवेग उठने लगे 

मिटटी में दबे बीजों से अंकुर फूटने लगे 

पतथर की स्मारिका जीवंत हो उठी 

शब्दों से आत्मा व्यक्त हो उठी 

कभी प्रीतानुरागी बन रोमांचित हुआ 

कभी रणविजयी बन आहलादित हुआ 

पर खुशिओं के आतिरेक ने दंभी कर दिया 

रिक्त अंतस को ज़ैसे तमस से भर दिया 

ज़ितना मिला  उतना संकुचित होता गया 

स्पर्धा ,तृष्णा बढ़ती रही मन उन्मादित होता गया 

यकायक दुखों की छाय़ा प्रकट हुई

टूट गये सारे मिथक 

सबसे हो गया पृथक 

भयभीत मृग सा, लिये मैं लिए कातर दृष्टि

जान गया था ,क्या है भेद सृष्टी 

मेरा निमित तो बढ़ जाना है 

प्रत्येक क्षण का गुजर जाना है 

मस्तक की सीमायें भलें अपरीमित हों

पद चिन्ह सदैव धरा तक सीमित हैं

मैंने मकड़जालों को हटाना सीखा 

खुशिओं को बांटना सीखा 

दुखों को संभालना सीखा 

कृतग्यता को ग्रहण करना ,कृतघ्नों को भूलना सीखा 

अब मैं पुनः स्वतंत्र हूँ 

प्रत्येक क्षण हेतु तटस्थ हूँ 

                                    …..पूजा सक्सेना

 ‘ईश्वर ‘

 अब वह ईश्वर भी खिन्न रहता है 

 जलती हुई सड़कों पर बच-बच कर निकलता है 

 मौत के तांडव को तटस्थ हो देखा करता है 

 कल जब वह भीड़ 

 एक खुले सांड की तरह 

 सींगे तरेरती ,निरर्थक उछलती 

 उसके नाम पर सब कुछ रौन्दे जा रही थी 

 तब वह स्वयं को ‘सर्वशक्ति ‘ कहने पर  

वह व्यंग्य से मुस्कराया था 

 उस कफ्र्यू लगे शहर की 

 मनहूस उदासी भरी सड़कों पर 

 गश्ती दलों की लाठियों की टेक 

 जब मेरूदंड की कशेरुकाओं को सिहराती थी 

 तब रह-रह  वह भी सिहर उठता था 

 वह कितना सुगम प्राप्य ईश्वर था 

 प्रत्येक रूप में समायोजित 

 प्रत्येक संभावना में अवस्थित 

 वाकपटु  प्रार्थनाएं हों या निशब्द करबद्धता ,

 रतनजड़ित सिंहासन हों या निराकार प्रतिबद्धता ,

 कर्मकांड के विधान हों या कर्मलीन की व्यस्त्तता 

 वह तर्कों से परे ,सबकी सुविधा का ईश्वर था 

 पर अब तो वह खेमों में विभजित ईश्वर है 

 अब जब वह ‘विभिन्न रूप एक ‘ मान्य ही नही रहा 

 तब वह अनर्गल विवादों से ज़नित विध्वंस पर 

 उदासीनता क्यों ना ओढ़े?

 पर निर्मल- निश्छल संवेदनाएं

 उसे आज भी नही रोक पातीं

 एक तेज दौड़ती सड़क पर 

 वह व्यक्ति बाल -बाल ही बचा था 

 पता नही उसका ईश्वर किस खेमें का था 

 पर उसके घर में एक नन्ही बच्ची थी 

 ज़िसकी आँखे उसके आने की राह देखा करती थींl

                         ….. पूजा सक्सेना …

                      

‘ वो बूढ़े मकान ‘

 झांकते हैं कुछ थके -बूढ़े मकान भी

 किसी अभिजात्य कॉलोनी में 

 आलीशान मकानों की वल्लरी में 

 ज़िनके अहातों में लगे ऊँचे पेड़

 अब सीना पकड़ खांसने लगे हैं 

 ढ़ीली पायों पर टिकी चारपाई सी ज़िनकी दीवारें

 अब चरमराने लगी हैं 

 सड़क से नीचे जा चुके चबूतरे

 ज़ैसे धूल को बरबस पसरने का न्यौता देते हैं 

 बारिशें इन्हे बहुत डराती हैं 

 छतों के छाते भी तो चूने लगे हैं 

 अपने समय का बेजोड़ स्थापत्य- शिल्प लिए

 बड़े- बढ़े दालान लिए ये मकान 

 जब अपने ज़माने का दम भरते हैं 

 तो हाँफने लगते हैं 

 समय की मार झेलते -झेलते 

 ये समय से पीछे छूट जाते हैं 

 समय तदनन्तर  बढ़ता जाता है

 मकान पुराने होते जाते हैंl 

 एक मकान से कई शाखें फूटने लगती हैं 

 मकान पुशतैनी होते जाते हैं l

 ज़माने की रीत निभा बेटियाँ विदा हो ज़ाती हैं 

 मकान उनके अतिथि बन करआने की 

 बाट जोहते रहते है

 इन्हे बनाने वाले 

 जो कल अपने पुराने मकान छोड़ आये थे 

 आज इन्हें छोड़ना नही चाहते 

 और   इनकी छतों -मुंडेरों पर 

 घटों किताबें ले पढ़ने वाले 

 अब इनमें लौटना नही चाहते 

 पर  ये मकान किसी से कुछ नही चाहते 

 खड़े रहते हैं बस ज़स के तस 

 अपनी मखमली आत्मीयता को समेटे हुए 

               ……..पूजा सक्सेना ,……

                     

‘जीवट’

यह समय का निष्ठुर दौर है 

हर आहट अनिष्ट सी प्रतीत होती है 

श्वांसो का क्रम भी विवश सा चलित है 

प्रत्येक दृष्टी सशंकित है 

नेत्रों से निद्रा विस्मृत है 

ज़ठरागिनी भी शमित है 

रोम-रोम भयाक्रांत है 

ना भोर ,ना साँझ का भान है 

पराजित घोषित हूँ

गहरे पानी उतरा हूँ  

हास – उपहास का विषय हूँ 

प्रतिद्वद्धियों के लिये एक बंद अध्याय हूँ 

अँधियारा सच में बहुत घना है 

चँहु ओर घुटा कुहांसा है 

बस मैं ही मैं को दिखता हूँ 

ना साथ कोई अपना ना पराया है 

किंतु ह्रदय स्पन्दित है ,देह ज़ीवित है 

यदि मैं मृत नहीं तो धिक्कार मुझे जो मैं सुप्त हूँ 

अब मुझे उठना होगा 

प्राणों को प्रमाण देना होगा 

खोने को कुछ भी शेष नहीं 

पाने का प्रण ही ध्येय है 

मैं कतरा- कतरा समेटूँगा

हर ज़ड़ को चेतन कर दूँगा 

बँद राह खोलूँगा 

या नई राह गढ़ लूँगा 

अब स्वयं का स्वयं से युद्ध है 

मन विजय हेतु कटिबद्ध है 

सशस्त्र लड़ूँ या निःशस्त्र

योद्धा हूँ ,हार नहीं स्वीकारूँगा 

जन्म की सार्थकता सिद्ध करूँगा

ज़ननी का ऋण ऊतारूँगा 

                 …डॉ पूजा सक्सेना ….

‘साधक’

अमूल्य क्षण हैं ये ,

किसी पर्ण पर बिखरी बूँदो सदृश्य 

कभी द्रुत,कभी मद्धिम गति लिए

कभी मधुर,कभी कटु वृत्ति लिए

निरनिमेष रखते हैं मुझे

कहीं पलकें गिरें और हो जायें अदृश्य

मैं एक साधक हूँ 

एकाकी ,एकाग्र ,एकनिष्ठ 

ये विरक्ति,ये रुक्षता 

अपरिहार्यता है मेरी 

उदात्त तरंगे आतुर हैं ,छूने को 

मैं विलग करता हूँ उन्हे ,लौट जाने को 

स्वपनदृष्टा हूँ खुले नेत्रों का 

क्यों कि अपहृत जो हूँ बंद नेत्रों का 

प्रलोभन नहीं रोक पाते मुझे 

मैं ऐसी अवरोधी शिला हूँ 

जो किसी भी प्रवाह से परिवहित नही होती 

हमवयों की उमंगे हो या उत्सव – बहारें 

घटाओं घिरा गगन या पुष्पित चमन

जेठ की अलसई दुपहरी या जाड़े कि नरमई धूप 

मुझे नही रिझा पाती 

मैं मेरे लक्ष्य का चितेरा हूँ 

कर्मभूमि में उतरा हूँ 

पथच्युत नही हो सकता 

यदि बहका तो नही बढ़ सकता 

दीर्घा का मूकदर्शक बना रहता हूँ 

जानता हूँ मोहक क्षणों को खो रहा हूँ 

किंतु मंजिलें यूँ ही नही मिला करतीं

हिमशिलाएँ बिना तपे नही पिघला करतीं

लक्ष्य ही मेरा धर्म है 

साधना मेरा कर्म है 

निष्ठा मेरा मर्म है 

क्यों कि मैं एक साधक हूँ 

                 ……..पूजा सक्सेना ….

‘खुशी’

       

खुशी, कल मिली थी मुझसे एक सोते बच्चे के स्मित अधरो में,

मोहक,प्रमुदित,कुटिल,स्वयं में खोये स्वरों में 

मैने पूछा कौन हो तुम चंचल हो,अधीर हो य़ा रहती हो कहीं व्यस्त,

कितनी मनुहार पर आती हो,नहीं रहने देतीं अल्मस्त 

खुशी वेदना व व्यंगय मिश्रित मुसकराई,

बोली इतनी सहज,सरल,सौम्य मेैं पर कभी ना इठलाई 

मैं तो हूँ शरणार्थी ,कभी मन के पाट तो खोलो 

मंथर समीर का झोंका हूँ कभी स्वयं को तो टटोलो 

भौतिकता में तलाशते हो और कहते हो हूँ क्षणिक,

बसेरा ढूँढते हो मेरा नहीं मानते प्रमाणिक 

मैं देवालय के शँखनाद में,मैं अंजालि के प्रसाद में 

मृदा के भँगुर कणों में ,पानी के बुलबुलों में 

पुष्प की वर्तिका में ,भ्रमर के गुंजन में 

पुस्तकों की धूल में ,कारखानों के धुएँ में 

चलती लेखनी में,प्रतयेक शब्द की वर्तनी में 

मैं हर मन का भाव हूँ,सुगम उपलब्ध हूँ

कपटी के लिये दुर्गम किंतु सरल का प्रार्बध हूँ

कभी संसारिकता से मुक्त हो तो न्यौता भेज देना 

मन की परतों को खोदना,बिना दस्तक दिये अंदर बैठे देख लेना 

मैं तो हू मृगमारिचिका ज़ितना पीछे दौड़ौगे उतना छकाऊँगी 

ठहराव ले लोगे तो तुम में ही समा जाऊंगी

सोते बच्चे ने नींद में जोर से  किलकारी भरी

अब खुशी उसकी माँ और मेरे अधरों पर भी आ बसी 

                                          – पूजा सक्सेना

‘झरोखा’

            

 एक पुराने भवन के कक्ष का झरोखा 

 था भाल के अलंकरण ज़ैसा 

 सदा स्वयं पर मान करता 

 रचयिता हेतु कृतज्ञ रहता 

 चाहें हो सौर रशमियों की उष्ण सतरंगी आभा 

 या हो छनी चन्द्र मरीचियों की शीतल प्रभा 

 सबका प्रदाता वही बनता  

 गार्वित भाव तब द्विगुणित हुआ 

 जब एक कपोत युगल ने उसे नीड़ चुना 

 हर्ष- पुलक का पारावार  ना रहा 

 अब वह आश्रयदाता भी होगा 

 उसके आसन में नव सृज़न होगा 

 समक्ष था सकल विस्तृत विश्व 

 और वह था छलनी ,कपाट रहित लघु रूप 

 फिर भी संरक्षक चुना गया 

 कृतकृत्य हुई उसकी लघुता 

 तृण-तृण संग्रहण का साक्षी बना

 क्या अद्भुत थी तल्लीनता  

 किसी  ने सूर्य उदय से अस्त एकाकार किया 

 तब कहीं एक घरोंदे ने आकार लिया 

 किंतु कितने अनभिज्ञ थे अबोध ,कहाँ था प्रबोध 

 यहां तो सबकी परिधि है

 ज़िसमें यह अनाधिकृत प्रविष्टि है

 अनामंत्रित अतिथि किसे भाते हैं 

 नेत्र कांकर भला किसे सुहाते हैं 

 दो निर्भाव हाथ उठे

 किसी का आसरा लील बैठे

 अब झरोखा रिक्त था 

 मात्र ईंट- प्रस्तर अवशिष्ट था

 किसी के शून्य विस्फारित नेत्र थे 

 और वह स्थिर पिंजर सा शेष था 

 उसने नवनिर्मित भवनों की ओर देखा 

 अब तो उसे अपने अस्तित्व पर भी संदेह था l

                    ……डॉ पूजा सक्सेना ……..

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