‘अनुत्तरित'(unanswered)

लहरों से समंदर ने किया प्रश्न।
क्यों आंदोलित रहती हो प्रतिक्षण?
दिवा हो या हो रात्रि।
यूँ ही तट को छूना-लौटना, छूना-लौटना।
रहती है एक अनर्गल सी उथल-पुथल।
स्वरों की एक जैसी सी खुसर-पुसर।
झिंझोड़ती हैं तुम्हें चलती हवाएं।
उखाड़ देती हैं तूफानी बलाएँ।
चाँद की घटत-बढ़त रिझाती।
जमाने की गर्मी तुम्हें सुलगाती।
प्रत्येक क्रिया पर ये प्रतिक्रिया क्यों?
दूसरे भी तो मौन रहते फिर हम ही क्यों?
थोड़ा थमो तो हम भी प्रमुदित हों।
स्निग्ध-शांत में विभोर कर सम्मोहित हों।
अकूत का कुछ आनंद भी तो लें।
क्यों सदैव पाबंद ही रहें।
नियतवाही क्रम अनुत्तरित रहा।
निर्वहन तदनंतर चलता रहा।
क्यों उत्तरदायी प्रायः प्रत्युत्तर नही देते?
ओलमा सुन भी मौन ही रहते!
कि बागी लहरियों की यदि हलचल ना हो।
संघर्ष का यदि ये कोलाहल ना हो।
विराट अस्तित्व क्या बचेंगे?
मौनधारी अवधूत कब तक टिकेंगे?
देखी प्रत्येक छत्रछाया की एक सी नियति।
छाँव भी उसी से और उपेक्षा भी उसी की।
……पूजा’हरि’सक्सेना…
बून्दी, राजस्थान।

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‘सुहाये भर की’

मैं थी अपने देस में भली।
सखी बदली और मेरी जमती थी टोली।
मैं बिन बुलावे तो नही घुमड़ी।
उतावले सोते सी नही उमड़ी।
व्याकुल पलकों के पाँवड़े बिछे।
मनुहार चली,देव पूजे-ढोके।
मैं तभी झमाझम बरसी।
झाड़ अंटी,झड़ लग अटकी।
करे गीले समस्त गात-पात,घाट-बाट।
भरे लबालब बासन-बाँध, पोखर-तालाब।
सूनी पहाड़ियों को मैंने पखारा।
उघड़ी देह को हरा पहना ढाँका।
मैं कुछ दिन क्या टिकी?
ऊब बन खटकी?
कीट-जोंक मेरी गिरोह के।
काई-सीलन मेरी गिरह के।
रात की काली ठसक मैंने लूटी!
तारों की चटक चाँदी मैंने कूटी!
शीशे के किवाड़ मेरे मुँह पर भिड़ाये।
याचक बन मैंने कितने खटखटाये।
हार मैं टकरा-टकरा वहीं लुढ़की।
अंदर वालों की सुनी मैंने घुड़की।
मन भर गए को अब क्या खिलाना?
भर पाये को क्या छलकाना?
मनुज का नुगरापन यही है।
मेरा भी रूकने का मन नही है।
ताल अभाव से जब पुनः रीतेंगे।
उसी आसमानी दर पर ही लौटेंगे।
…..पूजा ‘हरि’सक्सेना…

‘कोई ऊपर है!’

(बाल कविता)

आज उड़ान सिहर गई।
आशंकाएं बिफर गईं।
घरौंदे का पंछी था बहुत दूर।
अधिक जुगाड़ का रहा होगा फितूर।
सुबह सोने सी फैली थी आभा।
निश्चिंत होने की और क्या हो परिभाषा।
अनिष्ट का अंदेशा ना जाना।
निर्भीक हौंसलों ने खूँटा ताना।
पर्दे के पीछे का पर षड्यंत्र था तगड़ा।
दोपहर का रवि कर लिया अगवा।
निथरी धूप का उजास ऐसा पलटा।
नीला, कलास का सगा बन बैठा।
उँचे मेघ ऐसे बिगड़े।
घने हो दैत्य से उमड़े।
छाते से खुलने लगे बवंडर।
बिजली की चौंध थी बड़ी भयंकर।
अदृश्य हवा ने चोला उतारा।
सांय-सांय का सुर निकाला।
खंबे गिरे,खपरैल उड़े।
पेड़ों तक के पांव उखड़े।
निरीह का कलेजा मुँह को आया।
मन के डुबके ने जमकर डुबाया।
तिनके का घोंसला कहाँ बचा होगा?
नवजीवन का अंश क्या टिका होगा?
दृश्य का सामना कैसे करेगा?
भारी मन का पोटला किधर रखेगा?
उड़ते-उड़ते ठिकाना आया।
सहमा घोंसला सुरक्षित पाया।
वेग में कितना भी हो दम।
व्यूह का चक्र चाहे हो जोर जबंग।
जब डोर सारथी के हाथ होगी।
सीमाओं से परे चलेगी।
…पूजा ‘हरि’ सक्सेना…

‘विशिष्ट’

निर्वात का वह शून्य गुरुत्व
और दाबमुक्त भारहीनता का प्रभुत्व।
जहाँ ध्वनि का कोई संचरण नही।
माध्यम का कोई बंधन नही।
वहाँ एक वीतरागी उतराता है।
अनकहे-अनदेखे को सहलाता है।
डाल से टूटते किसी गुलाब की सुबकी को।
पाँव से धकियाते कंकड़ की धुकधुकी को।
रौंदी जाती उस घांस के क्रन्दन को।
हवा से हिलते आम लदे पेड़ के स्पंदन को।
वह जग मानकों को छानता है
और निरपेक्ष हो आंकता है।
प्रत्येक जलधार का लक्ष्य सागर तो नही।
प्रत्येक आधार की आकाँक्षा भर जाना भी नही।
क्यों संपदा संपन्न विस्तार में ही गिरना?
अपार में उलट हिल-हिल हिलोरें भरना?
कोई उन्मत्त हो तल-तल बहे
और सर्वस्व हार-वार भूमिगत हो हुलसे तो?
कोई दिन-दिन चले ,थके
और किनारे को ही चुन ले तो?
चलन में नही पर चलना
और बंद द्वार से पुनः-पुनः लौटना।
वह सामान्य नही अतः स्वीकार्य नही।
वह भिन्न है तभी वह विशिष्ट है।
पूजा सक्सेना…
English translation-

‘अमलतास’

क्या धुनिये ने पीला धुना?
ये कब चुपके से फलन हुआ?
ओर-छोर रूमाली कंदीलें।
सुनहरी-फरहरी लटकीं लटकनें।
जैसे निर्जन खोद में सोना हो चमका।
सब कहें अमलतास झलका।
सुलगता सन्नाटा और ताव ज्येष्ठ का।
पत्तों को पछाड़, कब्जा पुष्पों का।
हरिया हारा,पिलुआ दमका।
श्रेष्ठ का ही तो सिक्का चमका।
सुंदर स्पर्धा में हार भी गहना।
नेपथ्य में भी कुछ दिन रहना।
कहे कोई विलग संयोजन ही मनोहारी।
एकरंगी छटा ने नहीं बाजी मारी?
दुपहरी का रहा धधकता मंजर।
तिपहरी का धुलियारा अंधड़।
अंधियारी निशा का दूधिया समंदर।
मनचाही मिले तो सह लो बतंगड़।
रूप-लावण्य सिर चढ़ बोला।
चलते-फिरतों ने भर-भर ढोला।
कहीं मद ना उसे कर दे बौरा।
क्रुद्ध काल थमा दे कटोरा!
किंतु शिल्पी ने किसी को ना छोड़ा।
लकीरों में सभी के पेंच जोड़ा।
भद्दी फलियों का यहाँ अंबार टाँगा।
नजरौना मानो ,लगे बुरा है टाला।
…पूजा ‘हरि’ सक्सेना..

‘उड़ानें’

ये नव-नूतन,निर्बल पर।
उत्सुक किंतु कातर से।
उष्मायन की मखमली त्यज।
निष्पादन की उपलब्धि लपक।
कोष भेद प्रकट हुए।
आश्रय का घोंसला।
चोंच का चुग्गा।
सहज अवतरण, सहज प्राप्ति।
किंतु श्वेत-धूसर वह नीलफलक।
कितना अपरिमेय, कितना अनिश्चित!
आमंत्रक भी,आक्रामक भी।
संरक्षक हस्त छूटा।
सहोदर साहचर्य उड़ा।
कौतुक परों का व्याकुल असमंजस
तो क्या एकमात्र का है रंगमंच?
असंख्य चुनौतियाँ मुँह -बाये।
आ खड़ी हो रहीं गाहे-बगाहे।
किसी अदृश्य डोर ने किया चेत।
अब अगोचर विश्वास का भरो तेज।
भीतर लाख भीति रहे।
समक्ष हिम्मती दिखो।
कृषकाया की विवशता रहे
तो बली का स्वांग धरो।
ओर-छोर जहाँ ना दिखे।
वहाँ दृढ़ता की ध्वजा रोपो।
बूते की उड़ाने उड़।
स्वनिर्भर हो जीओ-जीतो।
….पूजा सक्सेना…

‘आवर्तन’

मात्र दिशाओं का ही फेर है।
ये कर्ता क्यों ढेर है?
रीति-नीति को भय कैसा?
ये प्राची-प्रतीची का प्रमेय कैसा?
लौटते खुरों की धूल है,धांस नही।
निशिचरों की कोई इतनी भी धाक नही।
ना उदयाचल कहीं, ना अस्ताचल कहीं।
सम्मुख छोरों पर है रक्तिमा वही।
कहीं तिमिर चीरता उजियारा।
कहीं गहन गहराता झुटपुटा।
वह यौवन से उद्दीप्त।
यह उपार्जन से प्रदीप्त।
भर अंबर यदि झिलमिलाती रात होगी।
तो तारों से ही टिमटिमाती बात होगी।
लौ लालटेन ले डटे रहना।
सोयेंगे सभी तुम तो जगे रहना।
पश्चचिन्ह भी तो दृष्टान्त देगें।
समेट उजास झोली भरेंगे।
छूटी छाप के वे सोते।
रूकेंगे किसी के रोके।
अब कि एक स्फटिक पौ फटेगा।
धुंधलाता मयंक भी तो परिचित दिखेगा।
…..पूजा सक्सेना….

‘पतझड़’

वह झर-झर झड़ता गया।
निशंक,निर्भीक फाग सा बहा।
पीत पात सर्द-शुष्क हवा हुए।
वासंती राग जो जम कर हावी हुए।
वह ठूंठ अधेड़ सा खड़ा।
बुहारो उसे।वह राह का ढेर हुआ।
मुमुक्षु था,अचिन्त्य रहा।
विधि दास था,कर्म तंत्र में जिया।
हवा के कयास,ऋतुराज की आस।
विलाप ना आलाप, सहज सह गया।
रौबीला-हठीला वह पुष्ट तना।
विपरीतार्थियों को क्या गच्चा दिया।
मौन के स्वर रहें और कोई सा पहर चले।
समभाव रखा तभी निर्बाध दिखा।
वह कल कच्च हरा-हरा होगा।
विहंग कलरवों का आसरा होगा।
पुनः अणु-अणु गुण गर्जन होंगे।
निर्णायकों के पुनरावलोकन होंगे।
वह सघन छांवधारी क्षेत्रपति होगा।
और वही मूक-टूक हिलोरें लेगा।
..पूजा सक्सेना….

‘गुड़हल’

जड़ जैसे जाड़े का अंत हुआ।
ठिठुरा उपवन अब लामबंद हुआ।
कुंद-मंद ज्यों मांद से निकला।
शीत पुष्पन हौले से खिसका।
ऋतुओं के नियत चक्र ने देखा।
एक आया, एक गया।
किंतु समय स्वतंत्र, समय सापेक्ष।
कोई ऐसा था ,जो बना रहा।
वह स्थानीय गाढ़ा गुड़हल।
सदापर्णी था,सदापर्णी रहा।
कुठार-तुषार के थपेड़े थे।
तापाघात के कोड़े थे।
वह थोड़ा-थोड़ा बदरंग हुआ।
किंतु संग सोया, संग जगा।
वह सगा क्या जो मौसम ताके?
वह श्रद्धा क्या जो विपरीत में भागे?
उनींदे फूल तक उसके पाबंद।
डाल से टूटकर भी दिखे चाकचौबंद।
गंधविहीन और शूलमुक्त।
क्या पात और क्या पुष्प।
उसका रहा सर्वांग समर्पित।
पुष्प संवर्ग में फिर भी था उपेक्षित।
प्रेयसी के तो मन ना भाया।
मालिन ने भी कहाँ सजाया?

ये रूप-रस के भौंरे तो क्षण भर के।
इधर उड़े कभी उधर उड़े।
गुणों के चितेरे प्रतिक्षण के।
घुले-मिटे को भी अमिट रखें।
उसे निष्ठाओं के प्रतिफलन स्वरूप।
सिंहवाहिनी ने सिरमौर बनाया।
….पूजा सक्सेना…

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